मेरी कलम से !!

कहते हैं जो गिरने से डरा नहीं करते, अक्सर वही आसमान को छु लिया करते हैं.........

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Pradeep Kesarwani


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हिन्दी को एक नया आयाम देती हिन्दी ब्लॉगिंग “Contest”

Posted On: 20 Sep, 2013  
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फिर फ़ेसबूक

Posted On: 9 Sep, 2013  
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नेता नही क्रांतिकारी चाहिए…..

Posted On: 16 Apr, 2013  
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हाय ये तड़पन

Posted On: 12 Apr, 2013  
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मैने मेरे जाना अभी है जाना……..

Posted On: 9 Apr, 2013  
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अब जीना ही तेरे बिना

Posted On: 7 Apr, 2013  
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हाँ मैं साथ हूँ तेरे

Posted On: 4 Apr, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

के द्वारा: Pradeep Kesarwani Pradeep Kesarwani

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Rahul gupta Rahul gupta

जी सुनकर बहुत अच्चा लगा की दक्षिण भारतीय भी हिंदी भाषा को पढ़ने तथा सिखने के लिए प्रेरित रहते हैं, पर मैं आपसे विनम्रता से पूछता हूँ , अगर वो मानुभाव आपसे दक्षिण भाषा में लिखे हुए लेख को लाइक करने के कहते तो क्या आपको दक्षिण भारतीय भाषा में लेख पढ़ने तथा सिखने समझने की इक्षा नहीं जागृत होती ? यमुना पाठक जी में ये जरुर आपसे बताना चाहूँगा मेरी एक दोस्त जो को चाइना से हैं, हम अक्सर स्काइप पर बाते करते हैं, सच मानिये मेरी भी ललक रहती हैं चाइनीज सिखने की बल्कि थोडा बहुत शब्द मैंने सिखने की भी कोसिस की हैं. और मैं उनकी भाषा की बहुत इज्ज़त भी करता हूँ. पर अंततः लगाव और प्रेम मुझे हिंदी से ही हैं. यमुना पाठक जी, दोष तो हमारा ही हैं, क्योकि हम ही सजीव हैं हममे ही कुछ करने तथा करने वो समझ जो की हमें तथा देश को एक नयी रह पर लेकर आये, और जब हम ही भाषा का निरादर करने लगे तो कोई निर्जीव थोड़ी उसे उभरेगा. हम खुद अपने में इतने मसरूफ हो चुके हैं की देश कोई छोडिये हम अपने घर की समस्यें सुलझाते-२ एक दिन मिटटी में विलीन हो जाते हैं. आपने अपना अनुभव बताया और मुझे कुछ सिखाने का अवसर दिया बहुत बहुत आभार

के द्वारा: Pradeep Kesarwani Pradeep Kesarwani

के द्वारा: ram kumar ram kumar

प्रदीप जी आपने यह लेख हिन्दी भाषा को बाज़ार की भाषा मान कर लिखा है पर मैं आप को स्वानुभव से दो बातें बताना चाहती हूँ,हो सकता है ये बात मेरे निजी अनुभव के कारण वैश्विक चर्चा का विषय ना बन पाए पर बताना ज़रूरी समझ रही हूँ १ मेरे एक मित्र दक्षिण भारतीय हैं प्रतिष्ठित जागरण मंच के फेस बुक पेज लाइक करने के लिए उन्हें निवेदन किया उन्होंने बहुत खुशी से उसे पसंद किया और चूँकि वे देवनागरी लिपि की हिन्दी पढ़ नहीं पाते पर हिन्दी भाषा समझ लेते हैं वे अपनी धर्मपत्नी से पोस्ट पढ़ कर समझने में रुचि लेते हैं साथ ही कोशिश भी करते हैं की स्वयं भी हिन्दी पढ़ सकें . २ कुछ दिनों पूर्व मैं खजुराहो गई थी वहां विदेशी पर्यटक आये थे .उसमें से एक की दिलचस्पी हिन्दी भाषा में ऐसी थी की उसने गाइड को कहा ,"तुम्हे पता है भारत आने से पहले मैंने थोड़ी हिन्दी भी सीखी है. दरअसल गलती हम भारतीयों से ही होती है हम किसी को सूत बूट में देखे नहीं की बस उनकी जुबान में बोलने लगते हैं . साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: Sunil pal Sunil pal

के द्वारा: Bhagwan Babu 'Shajar' Bhagwan Babu 'Shajar'

के द्वारा: विजय कुमार सिंघल विजय कुमार सिंघल

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के द्वारा: prateek56 prateek56

के द्वारा: Richa Rajpoot Richa Rajpoot

के द्वारा: Neha Kushwaha Neha Kushwaha

"ये परिवर्तन ही तो हैं इस मंच पर न कोई संपादक हैं और न ही रचयिता, सब हिंदुस्तान के आम नागरिक की तरह अपनी बातों को अपनी बुद्धि क्षमता के हिसाब से लिखते हैं और सम्पादन हेतु पोस्ट करते हैं। इस पेड़ की हर पत्तियों मे जैसे हिन्दी समाई हैं वैसे ही अब हमको अपने रोम रोम मे हिन्दी को बसाना हैं।" दोस्त लेख बहुत अच्छा लिखा, जागरण जंक्शन मे पोस्ट हो रहे अधिकांश दोस्तो के पोस्ट पढे मैंने लग रहा है हम हिंदुस्तान मे रह रहे है, आज हिन्दी देवनागरी लिपि मे हम अपनी बात ब्लॉग पर लिख सकते है बेहतर से बेहतर ढंग से अपनी बुद्धि क्षमता के अनुसार, दूर दूर तक अपनी आवाज़ पहुंचा सकते है, अधिक से अधिक लोगों को अपने सर्कल मे जोड़ सकते है, सुविधाएँ बहुत सारी है बस थोड़ी मेहनत है हिन्दी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हमे ही करना है, अब अगर हम ही पीछे रह गए तो शायद ही हमारी अगली जनरेशन हिन्दी के महत्व को समझ पाएगी। बहुत बहुत शुभकामनायें इस लेख के लिए :) प्रसनीत यादव

के द्वारा: Prasneet Yadav Prasneet Yadav

के द्वारा: prakash jaiswal prakash jaiswal

के द्वारा: Pradeep Kesarwani Pradeep Kesarwani

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के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: Pradeep Kesarwani Pradeep Kesarwani

jlsingh जी हर चीज़ के दो पहलू होते हैं.... पर एक ही मछली काफी होती हैं पूरे तलाब को गंदा करने के लिए.... उदाहरण के लिए मैं आज तक का पोस्ट पढ़ा था... मतलब बहुत सारे लोग हैं जो आज तक के समाचार को पढ़ते हैं और वो भी वही प्रतिकृया पढ़ने पर विवश हो जाते हैं जो की कुछ अराजक तत्व करते हैं .... जैसा की मैंने अपने पोस्ट मे कहा हैं उनकी प्रतिकृया अपने ईश्वर के बारे मे थी..... कोई भी इंसान को वो अपने ईस्वर के बारे मे अगर कुछ गलत सुनेगा तो उसको जो महसूस होगा वो आप समझ सकते हैं..... बस मेरे कहने का यही तात्पर्य था की की अगर हम लगातार किसी चीज़ को देखेंगे तो वही चीज़ हमको विवश कर देती हैं अपनाने को जैसे की फ़ेसबूक पर अँग्रेजी भाषा हैं ...... आपके विचार के लिए धन्यवाद...........

के द्वारा: Pradeep Kesarwani Pradeep Kesarwani

विचारणीय पोस्ट! पर, फेसबुक पर सिर्फ वही नहीं होता जो आपने लिखा है - हर चेज के दो पहलू होते हैं .. अब ये आपको सोचना है कि आप उसे किस तरह से लेते हैं. ब्लॉग्गिंग भी एक प्रकार का नशा ही है कुछ लिखने का अपने विचार व्यक्त करने का .. अगर विचार व्यक्त न हुए दबे रह गए तो उसका परिणाम भी घातक ही होता है. फिल्मे हम किसलिए देखते हैं - मनोरंजन के लिए ही न या किसी फिल्म को देखकर बड़ा परिवर्तन हुआ है? हाँ अपराधिक गतिविधयां जरूर बड़ी हैं फिर भी फ़िल्में बनती हैं और लोग महंगे टिकट खरीद कर देखते ही हैं ... सुना होगा आपने भी 'चेन्नई एक्सप्रेस' के बारे में. अब आता हूँ आपके विचार श्रम के बारे में - तो यह भी सही है कि जो आदमी श्रम करना जानता है /चाहता है वह भूखा नहीं रह सकता गरीब नहीं रह सकता - गरीबी का रोना भी आलसी और कामचोर लोग ही रोते हैं, अलबत्ता सरकारें भी उन्ही के भरोसे चलती हैं और नित्य नए कानून उन्ही के लिए बनाये भी जाते हैं - जैसे खाद्य सुरक्षा बिल ... संसद में लोग कितना समय और धन बर्बाद करते हैं ... चुनाव प्रचार में ... और क्या क्या गिनाऊँ आप भी सब जानते हैं...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: Shweta Shweta




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