मेरी कलम से !!

कहते हैं जो गिरने से डरा नहीं करते, अक्सर वही आसमान को छु लिया करते हैं.........

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जब शर्म लगे बोलने में तो सम्मान की मैं हकदार नही "मैं हिंदी" "Contest"

Posted On: 11 Sep, 2013 Contest में

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इस तथ्य से मे भी सहमत हूँ की हिन्दी बाजार कि भाषा हो गई हैं और दिन प्रतिदिन हिन्दी भाषा का दायरा संकुचित होता जा रहा हैं। और अंग्रेज़ी दिन प्रतिदिन पंख फैलाकर अपना दायरा बढ़ाती जा रही हैं और हमारे ऊपर हावी होती चली जा रही है, आज हम हिन्दी से ज्यादा अँग्रेजी भाषा बोलने मे फक्र महसूस करने लगे हैं । और मुछों पे ताव देते हैं की हमे अग्रेज़ी भाषा आती हैं। आज भले ही पूरे देश मे ४२ करोड़ से ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हो पर मन मे हिन्दी के प्रतीय वो इज्ज़त, वो समान्न खोता सा जा रहा हैं। कारण तो बहुत हैं पर मुख्य रूप से एक ही कारण जो मुझे लग रहा हैं वो हम हैं हमारे पूर्वज  थे जब हिन्दी भाषा का दमन हो रहा था तब कोई क्रांति क्यो नही आई, और आज जब हिन्दी भाषा खत्म होने के कगार पे आ खड़ी हुए हैं तो हम चुप क्यो हैं? आंदोलन तो हमेसा से होते आए हैं और होते भी रहेगे पर नतीजा आज भी दो राहे पर खड़ा हैं। शायद इसलिए की अँग्रेजी भाषा से होने वाले प्रतिबद्ध व्यवसाय या नौकरी की चाहत हमे कोई भी क्रांति लाने से रोक रही हैं अब तो बस इस जगह पे हम आके खड़े हो गए हैं कि आँख बंद करके चुपचाप हिन्दी भाषा के हो रहे अंतिम संस्कार को देखे और घर पर आकर सो जाएँ। अँग्रेजी भाषा का पाव इस कदर आगे कि ओर बढ़ता जा रहा हैं कि उसे रोकना मानो लोहे के चने चबाना जैसा हो गया हैं पहले तो सिर्फ प्राइवेट सैक्टर ही पूरी तरह से अंग्रेज़ी भाषा की गिरफ्त मे था पर अब ये पब्लिक सैक्टर पे भी हावी हो रहा हैं, अब तो साक्षत्कार मे पहले ही लिखा रहता हैं अग्रेज़ी भाषा अनिवार्य मतलब जो अग्रेज़ी भाषा बोलता हैं उसकी तो नौकरी पक्की नहीं तो बेरोजगारी भत्ते लेने के लिए लाइन लगाइए। अब इस परिस्थिति मे हिन्दी भाषा पनपे भी तो कैसे आज पूरे हिंदुस्तान मे साढ़े बारह करोड़ से भी ज्यादा लोग अग्रेज़ी बोलते हैं जो की पिछले दशको से बढ़ता ही चला आ रहा हैं कारण सिर्फ इतना की आय की स्रोत के लिए अँग्रेजी आना अनिवार्य हो गया हैं अब तो ये कहना गलत भी नही होगा कि हिन्दी भाषा गरीबो और अनपढों कि भाषा बन कर रह गई हैं। एक घटना याद आ रही हैं जब मैं विश्वविध्यालया मैं हमारे सभी सहपाठी गाव मैं पुनः सर्वेशण के लिए गए थे तभी एक गाँव के ही रहने वाला सज्जन नागरिक अपनी मोटर साइकल से आयें और आते ही हिन्दी के बजाए अँग्रेजी मे बात करने लगे और अपने घर ले गए और बताने लगे कि हमारे पास ये हैं – ये हैं और हम गाँव के काफी प्रबल लोगो मे से एक हैं । मैं उस समय समझ नही पाया इन सब का मतलब आज जाकर ये साफ हुआ कि वो आखिर मे कहना क्या चाहते थे यही कि मे अँग्रेजी भाषा जनता हूँ, इसलिए गरीब नही हूँ अनपढ़ नही हूँ। इस बात के साथ मे एक प्रोत्साहन हेतु कविता पेश कर रहा हूँ, उम्मीद हैं एक दिन हम इस तथ्य को झुठला देंगे की हिन्दी गरीबो की भाषा हैं।

“दमन चमन हुआ अंधकार

हिन्दी से अब किसको प्यार

उजड़ रहा हैं घरौंदा अपना

हम खड़े हैं पल्ला झाड़।

कुछ करना हैं कुछ बनाना हैं

तो ये सबको बतला दो

जो भटके हैं इस भवर मे,

हिन्दी उनको सिखलादों।

क्या है इज्ज़त क्या हैं सोहरत

जब भाषा का मोल नही

मत भूलो अपनी मात्र भाषा

क्योकि हिन्दी जैसा कोई बोल नही।

मत रूठो तुम मत टूटो तुम

अभी तो आगे बढ़ना हैं।

आपके इन हाथो से हमे,

अभी तो एक नया युग गढ़ना हैं”

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112 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ram kumar के द्वारा
03/10/2013

अभिलेख बहुत पंसद आया क्या खूब लिखा है

Rahul gupta के द्वारा
30/09/2013

आपका अभिलेख पढ़ा मुश्जे अच्छा लगा

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    03/10/2013

    राहुल जी हार्दिक धन्यवाद्

Soni verma के द्वारा
30/09/2013

आपकी कविता मुश्जे बहुत अच्छी लगी .. आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    03/10/2013

    सोनी जी हार्दिक धन्यवाद्

suresh3 के द्वारा
28/09/2013

अभिलेख अच्छा लिखा है आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    03/10/2013

    सुरेश जी हार्दिक धन्यवाद्

Pradeep Kashyap के द्वारा
26/09/2013

बिलकुल प्रदीप जी, अभी हमको लोगो के नया युग गढ़ना हैं…. कुशल लेखन आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    प्रदीप जी पेज पर आने, लेखन को पढ़ने तथा अपनी प्रतिकृया देने हेतु हार्दिक धन्यवाद

asha5 के द्वारा
26/09/2013

अभिलेख जो हिंदी के बारे में लिखा है वो मुस्झे अच्छी लगी आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    आशा जी पेज पर आने, लेखन को पढ़ने तथा अपनी प्रोत्शाहन बढाती प्रतिकृया देने हेतु हार्दिक धन्यवाद

ram kumar के द्वारा
26/09/2013

आपका का लेख बहुत ही सुन्दर और अच्छा है

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    राम कुमार जी पेज पर आने, लेखन को पढ़ने तथा अपनी प्रतिकृया देने हेतु हार्दिक धन्यवाद

Jaya Tiwari के द्वारा
26/09/2013

प्रदीप जी बस हम ही हर जगह गलत होते हैं, वरना ऐसे दिन ना देखने को मिलते जब ये कहना और सुनना पढ़ता की हिंदी से हम प्यार नही करते.. सुन्दर अभिलेख आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    जाया जी पेज पर आने, लेखन को पढ़ने तथा अपनी प्रोत्शाहन बढाती प्रतिकृया देने हेतु हार्दिक धन्यवाद

yamunapathak के द्वारा
25/09/2013

प्रदीप जी आपने यह लेख हिन्दी भाषा को बाज़ार की भाषा मान कर लिखा है पर मैं आप को स्वानुभव से दो बातें बताना चाहती हूँ,हो सकता है ये बात मेरे निजी अनुभव के कारण वैश्विक चर्चा का विषय ना बन पाए पर बताना ज़रूरी समझ रही हूँ १ मेरे एक मित्र दक्षिण भारतीय हैं प्रतिष्ठित जागरण मंच के फेस बुक पेज लाइक करने के लिए उन्हें निवेदन किया उन्होंने बहुत खुशी से उसे पसंद किया और चूँकि वे देवनागरी लिपि की हिन्दी पढ़ नहीं पाते पर हिन्दी भाषा समझ लेते हैं वे अपनी धर्मपत्नी से पोस्ट पढ़ कर समझने में रुचि लेते हैं साथ ही कोशिश भी करते हैं की स्वयं भी हिन्दी पढ़ सकें . २ कुछ दिनों पूर्व मैं खजुराहो गई थी वहां विदेशी पर्यटक आये थे .उसमें से एक की दिलचस्पी हिन्दी भाषा में ऐसी थी की उसने गाइड को कहा ,”तुम्हे पता है भारत आने से पहले मैंने थोड़ी हिन्दी भी सीखी है. दरअसल गलती हम भारतीयों से ही होती है हम किसी को सूत बूट में देखे नहीं की बस उनकी जुबान में बोलने लगते हैं . साभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    जी सुनकर बहुत अच्चा लगा की दक्षिण भारतीय भी हिंदी भाषा को पढ़ने तथा सिखने के लिए प्रेरित रहते हैं, पर मैं आपसे विनम्रता से पूछता हूँ , अगर वो मानुभाव आपसे दक्षिण भाषा में लिखे हुए लेख को लाइक करने के कहते तो क्या आपको दक्षिण भारतीय भाषा में लेख पढ़ने तथा सिखने समझने की इक्षा नहीं जागृत होती ? यमुना पाठक जी में ये जरुर आपसे बताना चाहूँगा मेरी एक दोस्त जो को चाइना से हैं, हम अक्सर स्काइप पर बाते करते हैं, सच मानिये मेरी भी ललक रहती हैं चाइनीज सिखने की बल्कि थोडा बहुत शब्द मैंने सिखने की भी कोसिस की हैं. और मैं उनकी भाषा की बहुत इज्ज़त भी करता हूँ. पर अंततः लगाव और प्रेम मुझे हिंदी से ही हैं. यमुना पाठक जी, दोष तो हमारा ही हैं, क्योकि हम ही सजीव हैं हममे ही कुछ करने तथा करने वो समझ जो की हमें तथा देश को एक नयी रह पर लेकर आये, और जब हम ही भाषा का निरादर करने लगे तो कोई निर्जीव थोड़ी उसे उभरेगा. हम खुद अपने में इतने मसरूफ हो चुके हैं की देश कोई छोडिये हम अपने घर की समस्यें सुलझाते-२ एक दिन मिटटी में विलीन हो जाते हैं. आपने अपना अनुभव बताया और मुझे कुछ सिखाने का अवसर दिया बहुत बहुत आभार

Sunil pal के द्वारा
25/09/2013

जो लिखा है बिलकुल सही है आज के दौर में……. आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    सुनील जी पेज पर आने, लेखन को पढ़ने तथा अपनी प्रतिकृया देने हेतु हार्दिक धन्यवाद

vinod kumar के द्वारा
25/09/2013

अभिलेख बढ़िया लगा कविता भी ……….

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    28/09/2013

    विनोद जी पेज पर आने, लेखन को पढ़ने तथा अपनी प्रतिकृया देने हेतु हार्दिक धन्यवाद

24/09/2013

बहुत अच्छा लिखा है. बधाई.

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    24/09/2013

    सिंधल जी लेख पढ़ने और प्रोत्शाहन के लिए हार्दिक धन्यवाद्

Raj Bahadur के द्वारा
23/09/2013

भाई प्रदीप जी जरूर हम सब मिलकर हिंदी पूरी दुनिया को शिखायेंगे आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    24/09/2013

    जी बिलकुल आप पढ़ने और प्रोत्शाहन के धन्यवाद्

vikash pathak के द्वारा
23/09/2013

आपका अभिलेख अच्छा लगा.आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    24/09/2013

    पाठक जी लेख पढ़ने व प्रोत्शाहन के हार्दिक अभिनन्दन

Shudha Bajpai के द्वारा
23/09/2013

आपका अभिलेख पंसन्द आया

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    शुधा जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

prateek56 के द्वारा
23/09/2013

आपने जो कहा है वो सही है

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    प्रतीक जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Richa Rajpoot के द्वारा
22/09/2013

बहुत सही लिखा आपने आभार

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    ऋचा जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Richa Rajpoot के द्वारा
22/09/2013

सुन्दर लेख आभार

Sonam Varma के द्वारा
21/09/2013

प्रदीप जी बहुत सुन्दर अभिलेख आभार… क्या है इज्ज़त क्या हैं सोहरत जब भाषा का मोल नही मत भूलो अपनी मात्र भाषा क्योकि हिन्दी जैसा कोई बोल नही। और सच में हिंदी जैसा कोई और बोल है भी नहीं…शुभकामनये

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    सोनम जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Veer Pal के द्वारा
21/09/2013

बहुत बढ़िया है हमको कविता अच्छी लगी और लिखो

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    वीर पाल जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Kaushal Soni के द्वारा
21/09/2013

ऐसा नहीं है की आज लोग हिंदी भूल गए आज भी हिंदी को जायदा महत्व दिया जाता है वो बात की बात है की लोग अंग्रेजी मैं वर्क करते है पर काम तो हिंदी ही देता है. लेख अच्छा है …

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    जी बिलकुल सही कहा अपने…कौशल जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

Gitanjali Verma के द्वारा
21/09/2013

आपका लेख अच्छा लगा ये आपकी सोच है या कुछ और ……..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    गीतांजलि जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

priyanka shrama के द्वारा
20/09/2013

आपने जो लेख लिखा है वो ठीक है पर क्या आज लोग पूरी तरह से हिंदी नहीं बोल रहे है मैं समझती हु की आज के युग मैं हिंदी और अंगेरजी का दुसरे पर निर्भर है जो साथ साथ बोली जाती है . धन्यबाद

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    जी बिलकुल सही कहा अपने… प्रियंका जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

ashutosh pandey के द्वारा
20/09/2013

अभिलेख अच्छा है मगर हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी बही जरुरी है क्युकी आज लोग हिंदी के साथ अंग्रेजी भी बोलते है और ये ही सही है कोई जायदा हिंदी नहीं बोल सकता है

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    जी बिलकुल सही कहा अपने…आशुतोष जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

prakash jaiswal के द्वारा
20/09/2013

ये तो है आज अंग्रेजी लोग बोलते है क्यों की अंग्रेजी उनकी इमेज को बड़ा देती है तो हिंदी क्यों बोले जो अभिलेख लिखा सही है . आभार प्रकार करता हु …

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    23/09/2013

    जी बिलकुल सही कहा अपने…प्रकाश जी लेख पढ़ने व प्रतिकृया हेतु प्रोत्शाहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

santosh pandey के द्वारा
20/09/2013

आपका लेख मुझे अच्छा लगा

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    20/09/2013

    जी धन्यवाद्

ra786 के द्वारा
19/09/2013

आपका का लेख अच्छा लगा आशा करता हु आगे भी और अच्छा लिखोगे ..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    20/09/2013

    जी बिलकुल .. धन्यवाद्

gupta4 के द्वारा
19/09/2013

देखो बात तो सही आज हिंदी के बजाय इंग्लिश में जायदा जोर दिया जा रहा है आज लोग अपने बच्चो को हिंदी मध्यम के बजाय इंग्लिश मध्यम में भजते है इसीलिए लोग हिंदी को भूलते जा रहे है आपने लिखा अच्छा लगा …

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    20/09/2013

    गुप्ता जी.. सही कह रहे है आप…लेख पढने वो प्रतिक्रिया देने हेतु धन्यवाद्

abhi123 के द्वारा
19/09/2013

यहाँ पर तो सभी लोग हिंदी बोलते है पर जब कार्य की बात होती है तो लोग इंग्लिश बोलना जायदा पसंद करते है क्यूकि हिंदी जायदा प्रभव नहीं छोडती है ………………..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    20/09/2013

    जी लेख पढ़ने और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

ravi78 के द्वारा
18/09/2013

सही कहा है अपने …………………………………

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    18/09/2013

    रवि जी पेज पर आने और लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद् ….

rajeev15 के द्वारा
17/09/2013

bahi वह मज़ा आ गया क्या लिखे हो यार धन्यबाद

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    18/09/2013

    राजीव जी प्रोत्शाहन के लिए धन्यवाद…

vijay786 के द्वारा
17/09/2013

PRADEEP JI APNE SAHI KAHA HAI

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    18/09/2013

    विजय जी पेज पर आने और लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद् ….

sinsera के द्वारा
16/09/2013

सराहनीय लेख और सुन्दर कविता के लिए बधाई…

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    18/09/2013

    सिंसेरा जी पेज पर आने और लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद् ….

meenakshi के द्वारा
15/09/2013

अभी तो एक नया युग गढ़ना हैं” – बस इसी बात को – साकार करना है ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    18/09/2013

    बिलकुल मीनाक्षी जी, धन्यवाद् ….

Bhagwan Babu के द्वारा
15/09/2013

बहुत ही बढ़िया लिखा आपने… . धन्यवाद…

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    जी धन्यवाद्

Guljar Ahamad के द्वारा
14/09/2013

pradeep ji apne bahut hi accha or samajik mudda uthaya hai apne blog ke jariye..hamara pura samaj aaj english(videshi bhasha) ki chapate me chuka hai..aaj apne bharat desh me ye esthiti ho chuki hai ager english nahi aati to noukari nahi milegi..aaj hamare desh me sabhi visay english me ho gaye hai hindi ka mano nishan mitta ja raha hai..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    प्रोत्शाहन हेतु धन्यवाद्

Sufiya Nayab के द्वारा
14/09/2013

ये तो सही हैं की आज हिन्दी से ज्यादा हम अँग्रेजी बोलने मे महसूस करने लगे हैं इसलिए सायद हिन्दी भाषा दिन प्रतिदिन कमज़ोर होती जा रही हैं सुंदर लेख बधाई … और सही कहा आपने हिन्दी जैसे कोई बोल नही …..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    बिलकुल सुफिया जी… प्रोत्शाहन हेतु धन्यवाद्

Jaya Tiwari के द्वारा
14/09/2013

सुंदर अभिलेख और कविता बधाई !!!

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    प्रोत्शाहन के लिए धन्यवाद्

Raj Bahadur के द्वारा
14/09/2013

बहुत ही सुंदर लेख ….. क्या है इज्ज़त क्या हैं सोहरत जब भाषा का मोल नही मत भूलो अपनी मात्र भाषा क्योकि हिन्दी जैसा कोई बोल नही।  और खूबसूरत कविता की लाइन……….. बधाई

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    राज बहादुर जी तहे दिन से धन्यवाद्

Richa Rajpoot के द्वारा
14/09/2013

प्रदीप जी बस हम भी यही चाहते हैं हिन्दी आसमान की उचाइयों को छु ले…. सुंदर कविता बधाई….

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    बिलकुल ऋचा जी हम होंगे कामयाब एक दिन ….

Ram Siingh के द्वारा
13/09/2013

ये तो सच बात हैं की हिन्दी के लेकर पहले भी बहुत आंदोलन हुए हैं पर हिन्दी को दर्जा अभी तक हम नही दे पाएँ हैं ,… बात सिर्फ भाषा को आम बोल चाल मे रखने की नहीं बात हैं उस भाषा को अपने जिंदगी जीने का स्रोत बनाना जैसे आय, शिक्षा, उपलब्धि इत्यादि…. सुंदर लेख बधाई

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    बिलकुल सही राम सिंह जी आम बोलचाल और कार्य करना दोनों अलग बात हैं.. प्रोत्शाहन हेतु धन्यवाद्

Anand Bhusan के द्वारा
13/09/2013

सोचनीय लेख और कविता के लिए बधाई॥

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    धन्यवाद आनंद भूसन जी…….

Santosh Varma के द्वारा
13/09/2013

भाई प्रदीप जी मैं सहमत हूँ आपने जो कहा हैं, मुझे याद हैं जब मे के निवेदन को हिन्दी टंकण मे करवाना था उसके लिए मुझे सुबह से साम हों गई थी, पर कोई टंकण वह नहीं मिल रहा था, बहुत ढूंढते -2 के मिला भी तो उसने एक पन्ने के लिए 25 रुपया मांगा जबकि इंग्लिश के लिए तो 10 रुपया ही लगते हैं ….. अब जब टंकण करवाने मे इतनी परेसनीया हो रही हैं तो आगे क्या होगा आप खुद ही समझते हैं… पर फिर आपकी कविता मे एक लाइन ने सब कुछ कह दिया ”मत भूलो अपनी मात्र भाषा क्योकि हिन्दी जैसा कोई बोल नही।” बहुत खूब सादर अभिनंदन ….

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    संतोष जी, धन्यवाद आपका आपने अपना कीमती समय देख अपने विचार प्रस्तुत किए……..

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
13/09/2013

प्रिय प्रदीप जी ..सार्थक और विचारणीय आलेख ..गाडी कुछ अब चल निकली है लेकिन दिल्ली अभी बड़ी दूर है ..शासन भी जागे …लोग अब जाग रहे हैं इन दिनों जब से हिंदी ब्लागिंग ने अपना पंख फैलाया है और कुछ कहीं कहीं सरकार ने भी हिंदी भत्ता के लिए ही सही…. थोडा ध्यान देने लगे हैं कुछ …सच में गर्व से आइये कहें जय हिंदी जय हिन्द …ये गरीबों की नहीं एक ससक्त समृद्ध भाषा है भ्रमर ५

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    15/09/2013

    निश्चित रूप से, आप जो कह हैं अब आगमन हो गया हैं बस अब तिरंगा फहराना बाकी हैं…….. और तहे …

meenakshi के द्वारा
12/09/2013

प्रदीप जी सुन्दर लेख और कविता के लिए बधाई ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    मीनक्षी जी सादर आभार………

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
12/09/2013

BAHUT SATEEK VISHLESHAN .BADHAI

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    शिखा जी लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद आपका ….

ushataneja के द्वारा
12/09/2013

बिलकुल सही कहा आपने- हिंदी जैसा कोई बोल नहीं| सादर नमन!

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    उषा जी आज भी जो फील आती हैं वो सिर्फ हिन्दी भाषा से आती हैं जो समझ और शिख मिलती हैं वो भी सिर्फ हिन्दी भाषा से ही मिलती हैं….. लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद…..

Neel Varma के द्वारा
12/09/2013

हिंदी मुख्या रूप से उत्तर भारत में बोली जाती हैं, अगर आप आकड़ा देखे तो उत्तर प्रदेश दिल्ली राज्यों में हिंदी का अब जिक्र वही होता हैं जहा कुछ नही होता हैं मैं आपकी यह बात से सहमत हूँ जब हिंदी द्वारा कोई आय हेतु कोई स्कोप नही होगा तो हम क्या करेंगे जब भूख लगती हैं तो सिर्फ आय का जरिया ही नज़र आता हैं चाहे वो हिंदी हो या अग्रेज़ी…. कविता में नही आपने जो हिंदी प्रोत्शाहन के लिए लिखी हैं वो भी काबिले तारीफ हैं बधाई स्वीकारें….

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    नील जी ये तो सही कहा आपने जब हिन्दी जहा सबसे ज्यादा बोली जाती हैं वही अब उसका सम्मान नहीं हो रहा हो तो बाकी के जगह पर आश लगाए भी कैसे……. लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद …..

Ram Sagar के द्वारा
12/09/2013

प्रदीप जी बात तो आप बिलकुल सही कह रहे हैं…. मैं पूर्ण रूप से सहमत हूँ…. मत रूठो तुम मत टूटो तुम अभी तो आगे बढ़ना हैं। आपके इन हाथो से हमे, अभी तो एक नया युग गढ़ना हैं”… उम्मीद हैं हम जल्द ही एक नए युग का निर्माण करेंगे ,,,,,

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    राम सागर जी आपका धन्यवाद……

Pooja Chauhan के द्वारा
12/09/2013

प्रदीप भाई सच अगर स्वीकार किया जाएँ तो अभी का जो समय हैं वो यही हैं सब जानते हैं की दूसरी भाषाएँ हिंदी को नौकरी की लालच देकर आगे बढती चली जा रही हैं, केवल बोलना मात्र हिंदी भाषा को उसका दर्ज़ा देना नही होता…..दिल से सम्मान निकले, उस भाषा को हम आगे बढ़ने के लिए उपयोग में लायें तब उसको वो दर्ज़ा मिलता हैं …… सुन्दर विश्लेषण और कविता के लिए बधाई

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    ये तो पूजा जी आपने सही कहा आपने बोलने मात्र से किसी भाषा को सम्मान और उच्च स्तरीय दर्जा नही दिया जा सकता जब तक की वो सभी के विकाश के लिए कार्यरत ना हो…… लेख को गहराही से पढ़ने के लिए धन्यवाद…….

Keshar Singh के द्वारा
12/09/2013

 बिलकुल सही कहा आपने जो चल रहा हैं अभी…. प्रदीप जी कविता के ढेरो बधाइयाँ ……

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    बस केशर के सच लिखने की कोसिस की हैं…. लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद

Minakshi Singh के द्वारा
12/09/2013

इसमे तो कोई दो राय नही हैं की इंग्लिश बिना जाने समझे और बोले हम अब काही पर भी नौकरी कर सकते हैं अगर भारत का जुगाड़ सिस्टम भी लगा कर नौकरी प्राप्त भी कर लेते हैं तो भी नौकरी करने मे परेसनीयां होने लगेगी क्योकि ऑफिस कर हर काम अँग्रेजी मे होने लगा हैं ……. जब अपने ही देश मे हिन्दी का इस तरह शोषण होगा तो कहा से पनप पाएगी हिन्दी ………… क्या है इज्ज़त क्या हैं सोहरत जब भाषा का मोल नही मत भूलो अपनी मात्र भाषा क्योकि हिन्दी जैसा कोई बोल नही। मन क्षुब्द करने वाली पंक्तिया …… लेख के लिए बधाई

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    मीनाक्षी जी बस सिर्फ आय का स्रोत हिन्दी द्वारा मिल जाए तो कोई भाषा हिन्दी भाषा का दमन नहीं कर सकेगी, लेकिन हिन्दी भाषा को आय के लिए कुछ करना होंगा…… आपका धन्यवाद

Dipali के द्वारा
12/09/2013

प्रदीप जी ये तो सही बात हैं की आज अगर आप महानगर मे चले चाहिए तो हिन्दी बोलने मे शर्म महसूस करने लगे हैं… और जब शर्म आने लगे किसी चीज़ या बातों से तो उसकी इज्ज़त नही रह जाती… और आपकी इस सुंदर कविता के लिए बधाई स्वीकारें……..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    दीपाली जी शर्म तो उस समय से महसूस होने लगी थी जब अंग्रेज़ याहा थे, अब तो आजादी के 66 साल हो रहे है तो आप खुद ही जान लीजिये आज क्या हो रहा होगा…….. आपका धन्यवाद

Rupa Jaiswal के द्वारा
12/09/2013

ये तो सही बात हैं हिन्दी भाषा जब तक आय के स्त्रोत की तरह मुख्य रूप से समाज के सामने नही आएगी तब तक यह गरीबो की भाषा ही काही जाएगी …बढ़िया लेख और कविता के बधाई स्वीकारें….

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    ये तो हैं रूपा जी अगर आय का स्रोत हिन्दी भाषा से हो जाए तो हिन्दी भाषा को मुख्य धारा मे लाने से कोई नही रोक सकता ….. आपका धन्यवाद

Pooja Kashyap के द्वारा
12/09/2013

प्रदीप जी मैं आपसे इसलिए सहमत हु क्योकि आप जो सच हैं वो बोल रहे कल्पनाओ की दुनिया मे नही हैं क्योकि जो हाल हैं हिन्दी है अगर देखना हैं तो महानगर चाहे जाइए सब आईने की तरह साफ हो जाएगा….. और कविता मे आपने हर बात पूर्णा रूप से सही हैं ….. बस अब ये देखना हैं की कब हैं एक नयें युग का निर्माण कर पाते हैं …..

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    बस पूजा जी सच को अगर हम स्वीकार ले वही अच्छा हैं काल्पनिक दुनिया मे जीने का कोई फायदा नहीं हैं ….. आपका धन्यवाद

amarsin के द्वारा
12/09/2013

एक दम सही बात, बहुत सुन्दर

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    अमर जी, बस जो आज हो रहा हैं वही लिखने की कोशिस की हैं॥ प्रोतशाहन हेतु धन्यवाद…..

seemakanwal के द्वारा
11/09/2013

वो दिन दूर नहीं है जब हिंदी का बोलबाला होगा ,आभार .

    Pradeep Kesarwani के द्वारा
    13/09/2013

    सीमा जी काश यही हो, और दिल से भी मैं यही चाहता हु…….


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